Saturday, 5 May 2018

ईश्वर

धीरे से आ, कानों में बोलता
वो जो अगनित प्रश्न करता है
शून्य को असंख्य से तोलता,
वो सम समस्त को करता है

ढक देता है कभी बादल से
कहीं रेत, तो कहीं बर्फ बन
जब पर्वत सा दम्भ उठता
धूलि धूसरित उसे करता है

कौन मेरी प्रार्थना सुन चुपसे
शूल राह के कुसुम कर देता
और कौन प्रकृति के प्रतिशोध
लेने को नृत्य तांडव करता है

वो जो हँसता है, रोता है, जब,
जब उसे पूजने वाले, लड़ते
पूजन की विधियों को लेकर,
सारे पुण्य तब पाप करता है





No comments:

Post a Comment