Thursday, 8 February 2018

मैं भी प्रकृति हूँ

कहीं से पानी सा बहता,
चला जा रहा हूँ,
मुसाफिर हूँ या हूँ में नदिया,
ठहर जाता हूँ सफर में,
मुझमे समा जाते है सारे मंजर,
साहिल हूँ या हूँ मैं दरया,
कहीं पे मेरी है ज़रुरत,
और कही हूँ गैरज़रूरी
कभी सफर की हूँ मैं मंज़िल,
तो कहीं राह अधूरी,
ये पेड़ों के गिरते पत्ते,
कल उन्ही पर फिर उगेंगे
बनके छोटी सी नन्ही कपोलें,
कर चक्र पूरा इक जनम का,
हवा के झोंके, न इनसे जलना,
नहीं है कुछ भी इनके बस में,
बदलते रहते हैं , अपनी सीरत,
ये हर वक़्त बदलते मौस्मों से,
बादलों का भी रूप देखा,
कभी गरजते , कभी बरसते,
कभी तैरते कपास बन कर,
मैं भी तो हूँ बस इन्ही सरीखा
कभी धूप हूँ , कभी हूँ छाया,
कभी त्याग हूँ , कभी हूँ माया,
कभी हूँ अपना, कभी पराया,
जो धारक है, उसकी आकृति हूँ
बदलता हूँ, मैं भी प्रकृति हूँ

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