Tuesday, 30 January 2018

समझो तुम जिन्दा हो

जब बादल में से झांकती धुप बुलाये,
जब सर्दी की गुनगुनी  घाम बुलाये,
जब बुलाये  भोर की  किरण सुनहली
जब बसन्त की दुपहरी सरेआम बुलाये

जब रंगीले फूलों के रंग भरा बाग़ बुलाये
जब जंगल से छनती वायु सनसन बुलाये
जब बुलाये  रेत चंदिली नादिया तट की
जब समंदर तट पर लहरें नटखट बुलाये


जब कभी गगन पर मेघ कपासी बुलाये,
जब मेघो में गुम सी पर्वतमाला बुलाये,
जब बुलाये हरे पत्तों पर बर्फ सफ़ेद,
जब धनुष गगन में  रंगों वाला बुलाये

समझ लो जीवित हो, अब भी मन में
है उमंग अभी भी बाकी  जीवन  में,
कहीं तुम्हारे अंदर, भोला बालक जीता है
रहता है स्वर्ग भीतर ही तुम्हारे मन में।

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