Friday, 13 May 2016

खेल ये हो शायद

Inspired by great poet of our times Javed Akhtar's poem Ye khel kya hai to hear the same please copy paste following link

https://www.youtube.com/watch?v=oeSW78Z87jg

My poem is from point of view of pawn which has been moved by opponent who has come out of his square and is waiting for opponents move

मैं अपने घर से
दूर खङा हूं
वजीर बनने का ख्व़ाब ले
मैं दुश्मन की फौज़ से
लड़ने जा रहा हूँ
मैं खड़ा हूँ कब से 
तेरी चाल के इन्तजार में,
इन्तजार लंबा है,
इम्तहान सब्र का,
ऐसा लगता है के,
देर के साथ चाल और ,
गहरी हुए जाती है.

चाल न चलना भी,
एक चाल हो शायद,
ये मुखालिफ मोहरों को
क्यूँ तके जाता है.
प्यादे संम्भालता है
बड़ी लगन से
कहीं कई वजीर बनाने की
ये साजिश तो नहीं .
चाल न चलने की ये चाल,
कहीं इसकी अपने राजा से
कोई अनबन तो नहीं.

और इधर मैं,
वजीर होने के ख्व़ाब ले,
अपने घर से
दूर खड़ा हूँ
मुखालिफ की चाल के इंतज़ार में. 

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