Monday, 9 May 2016

हँसी दौलत की मोहताज नहीं

जमीन पे पैर पसारे आदमी को देख,
आसमान के तारों में जलन क्यों है,
एक ग़रीब के घर में हँसी सुन कर,
खाली सा महाराज का मन क्यों है.


सारा घर जिसका खिलोनों से है भरा ,
ख़ुशी उसे फिर मिट्टी में खेल क्यों है,
कोई उड़न खटोलों  में भी रोता रहा,
कोई पतंगें देख ताली बजता क्यों है.

बातें जो दौलत ढूंढती आँखों  ने कही,
जमीं से जुड़ने का मज़ा, उड़ने में नहीं,
जुगनू की रौशनी, रेत का बिस्तर
मेरी हंसी किसी दौलत की मोहताज नहीं

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