Sunday, 3 April 2016

पत्थर का दिल

More of two liners written on during train journey then separated in two segments of Dil and Patthar

दिल 

नहीं जानता संग तुम्हारे, क्या पा रहा हूँ मैं
बस यूँ ही अच्छा लगा, तो चला आ रहा हूँ मैं .

मैं दिया तुम हो बाती, जलते हैं, रात जो मिलते हैं,
बुझ जाते हैं हम, जाने कैसे जुदाई में दिल जलते हैं.

न बहारों में भी लौटे , गए जो पिछले सावन में
सावन की है बहार, तब से, दोनों आखियाँ में

नहीं महल ताश का ये, झोंकों से बिखर जाए,
पर ताज तेरी यादों का, लेकर हम किधर जाएं

सागर सी गहरी आँखें, जो हमें देखती रहतीं  थी
न हम कह पाए थे जो, शायद वही वो कहतीं थी.
  
पत्थर 

समंदर दबा सीने में, देख मोती कहाँ तू पायेगा,
रूह की आवाज न सुन, ढूँढ क्या ले के जायेगा

हर हाल में सीने में, दिल ये धड़कता ही रहा,
मैं मशीन ना बन पाया, दिल ने कितना कहा.

फरिश्तों का चलना ज़मीं पर, मुश्किल हो गया
कल हैं चुनाव , सापों नेवलों में समझौता हो गया.

पी पी कर इसे जिन्दा हूँ, इसकी घुटों पे कैसे हूँ जिया,
सांप मुझे काटे औ' मर जाए, ऐसी ज़हर है ये दुनिया.

फूलों पर तो मिलें हैं, हम , कभी कांटो पर मिल बैठना,
हर संग में हैं रंग हजारों, टूटें तो उनके दिल देखना. 

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