Friday, 22 June 2018

प्रेम

बिरह में बदरा, बूँद बूँद बन बान लगी
सुध से साजन की उर में, सखी आस जगी
नीर नयन थे निहरे निर्जन राह नित नित
पग पग थे पढ़ते पाती प्रेम निश्वास सखी

साजन संग लगे सुर्ख सूर्ज भी सोने सा
मिल कर मैंने मनवा से मय लाज तजि
मादक मोहे किये मिलन का मोह मगन
ठिठक् ठिठक् जाऊँ थिरकूं ठगी ठगी

छू करके करसे कंचन मोहि काया की
चमक से मोरे चक्षु की ज्यो भोर उगी
देख उन्हें ह्रदय गदगद हुआ दिन दिन
बहियों में दीनी दुःख सब बिसार सखी

Sunday, 17 June 2018

तेरे आने से पहले और बाद

आवारा थी ये तन्हाइयां
बाग़ में तितली बनकर
याद तेरी से पाबन्द हैं ये
खुद को कमरे में बंदकर

जहाँ शाम हो वही रात
फिर सुबह और कहीं, पर,
तुझे मिलकर, तेरे कूचे में है,
 अब दिनभर अपना घर

कोई दिन सारी दुनिया का,
जिक्र होता था शब भर।
अब ये हाल है कि कहानी
शुरू तुमसे हो ठहर तुमपर


तेरे मिलने आने का विश्वास,
मुझे कम है, फिर भी मगर,
मन को आशा है, फैला आया
मैं पुष्प हर डगर, शहर भर

Monday, 4 June 2018

मुझे प्रसन्न रखना

जब रुक जाएँ ये साँसे तुम रुकना

करने आकलन मेरे जीवन का

मेरी हर हार और मेरी जीत का

तोल लेना इस जीवन को मेरे

सफलता विफलता के तराजू में

याद करना हर्ष अवसाद सारे

जो तुम्हे दिए, जाने अनजाने

बढ़ जाना जीवन में चुपचाप,

 तलाशने नए हर्ष, अवसाद,

तराशने नयी हार, जीत

ढूंढने नया सत्य जीवित

पर बंधना मत स्वयं को

किसी भी यादों के खूंटे से

क्योंकि,

 मैं निकल चुका होऊंगा

नए सत्य की तलाश में सृष्टि में

निरंतर विचरण करता हुआ

रहूंगा तारा बन तुम्हारी दृष्टि में

हसूंगा जब तुम प्रसन्न होगी

बन वर्षा बरसुंगा, हर अश्रु पर,

विनती है, मुझे प्रसन्न रखना

Saturday, 5 May 2018

ईश्वर

धीरे से आ, कानों में बोलता
वो जो अगनित प्रश्न करता है
शून्य को असंख्य से तोलता,
वो सम समस्त को करता है

ढक देता है कभी बादल से
कहीं रेत, तो कहीं बर्फ बन
जब पर्वत सा दम्भ उठता
धूलि धूसरित उसे करता है

कौन मेरी प्रार्थना सुन चुपसे
शूल राह के कुसुम कर देता
और कौन प्रकृति के प्रतिशोध
लेने को नृत्य तांडव करता है

वो जो हँसता है, रोता है, जब,
जब उसे पूजने वाले, लड़ते
पूजन की विधियों को लेकर,
सारे पुण्य तब पाप करता है





Monday, 30 April 2018

क्यों बन जाऊं मैं बुद्ध

हो जाता मैं बुद्ध
पर मुझे ज्ञान है
उस सत्य का जिसे
खोज नहीं पाए बुद्ध।
जब एक घर का पिता
चला जाता है तो, घर
कैसे बीमार हो जाता है
कैसे कमर झुक जाती है
यौवन में ही पुत्र की।
जब अपने कर्तव्यों को
छोड़ अपूर्ण पलायन करे
कितने स्वप्न मृत होते है।
सत्य धरती के जान के
कैसे मैं बन जाऊं बुद्ध
क्यों ढूंढ लाऊँ परासत्य
क्यों बन जाऊं मैं बुद्ध।

Saturday, 28 April 2018

कौन हो तुम

क्या ख्वाब मेरे तुझे भी
परेशान किया करते हैं
जैसे की सपने तेरे, मुझे
दिन में भी दिखा करते हैं।

तू चाँद तो नहीं है, और 
तू तबस्सुम भी तो नहीं
हुस्न न मुरझा बरसों से,
इसपे अमावस भी नहीं।

तू आफताब हो सकती थी,
चमक से तेरी लोग जलते हैं
पर याद में तेरी जो ठंडक है
हिमाला की चोटी में भी नहीं

कुदरत का हर हुनर है तुझमें
जुदा से लगते है जलवे तेरे
खुद तू ही बता अपने बारे में
कही तू खुद  ही ख़ुदा तो नहीं




Thursday, 26 April 2018

चुनाव और दोस्त

बदले बदले से वो हालात नज़र आते है
चुनाव आते हैं, दोस्त कहाँ चले जाते हैं
सबके चश्मों पर चढ़ा रंग बड़ा गहरा है
सबको जुदा जुदा, हालात नज़र आते हैं

किसी को समस्या में, केसरिया दिखता है
कोई इतिहास में इसकी जड़ ढूंढ लाते हैं
कोई दूर की कौड़ी, किस्से कथा लाता है
कोई अपना इतिहास अलग गढ़े जाते हैं

मेरे ये सारे यार दोस्त कही खो जाते हैं
कई तो दुश्मन हो जाते है चिल्लाते हैं
क्यों चुनाव आते हैं, दोस्त खो जाते हैं
कोई और हो जाते है, कहीं चले जाते हैं